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गणेश्वर सभ्यता | ganeshwar sabhyata rajasthan

गणेश्वर सभ्यता (ganeshwar sabhyata rajasthan) की विशेषता 

गणेश्वर सभ्यता से छ: प्रकार के मृदभाण्ड की जानकारी मिलती. है, ये मृदभाण्ड संग्रहण के मर्तबान, कलश तसले प्याले हांडी तथा मिट्टी के छलेदार बर्तन प्राप्त हुए है, जिसे कपि मृदभाण्ड / कपिषवर्णी मृदपात्र कहते है ।

गणेश्वर सभ्यता कंतली नदी के किनारे स्थित थी

गणेश्वर सभ्यता का कालक्रम 3000 ई. पू. से 2800 ई. पू. के आसपास माना जाता है ।

गणेश्वर सभ्यता के लोग संभवत: ताँबा खैतडी व अलवर की खो-दरीबा खान से प्राप्त करते थे ।

भारत में ताम्रयुगीन सभ्यता की उत्पत्ति तथा ताम्रयुगीन सभ्यताओं का विकास और प्रसार इसी सभ्यता से माना जाता है ।

यहाँ पर मछली पकडने का कांटा मिला है ।

गणेश्वर सभ्यता के उत्खनन के दौरान मिली दोहरी पेंचदार शिरेवाली ताम्र पिन इसकी प्रमुख विशेषता है, जो मध्य एशिया के विभिन्न सभ्यताओं से भी प्राप्त हुई है । 

गणेश्वर सभ्यता को ताम्रयुगीन सभ्यता की जननी कहा जाता है । 

इस सभ्यता के निवासी मासाहारी थे ।

गणेश्वर सभ्यता से ताँबे के फरसे व बाणाग्र आदि मिले है । 

गणेश्वर सभ्यता की खोज 1972 ई. में राजस्थान विश्वविद्यालय के पुरातत्व विभाग के प्रोफेसर रतन चंद्र अग्रवाल ने की व 1977-78 ई. में इसका उत्खनन रतन चंद्र अग्रवाल व विजय कुमार ने की

गणेश्वर सभ्यता से सम्बंधित महत्वपूरण प्रश्न : ganeshwar sabhyata rajasthan question

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